Powered By Blogger
लेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

दो शब्द दिल की कलम से


आज बहुत कोशिश करने पर भी कुछ नहीं लिख पाया। शायद अब लिखने के लिए बहुत कुछ हैं, बहुत कुछ में जो कुछ था लिखने के लिए वहीं कहीं खो गया हैं। कलम ने लिखने से इनक़ार कर दिया हैं, पृष्ठों से शब्दों ने दूरी बना ली हैं। मन अनमना हैं दिल कह रहा हैं लिख दूँ अपने प्रेम का इतिहास, दूरी की प्यास, कुछ छंद आस के विश्वास के।
लेकिन जब आस के सूर्य से विश्वास के देवता मुह फेर लें तो क्या रह जाता हैं, लिखने कहने के लिए। सिर्फ स्मृति के मानचित्र पर कुछ चित्र इतिहास के। जहाँ ह्रास-परिहास है, कुछ सपने हैं, रूठने-मनाने के सिलसिलें हैं, देर से आने के मौलिक बहाने हैं। उसके बहार फ़िर वहीं आह, आँसू, विरह, वैदना के समंदर में डुबने तेरने की नीरस, उबाऊँ प्रयास। नींद, चैन, सुक़ून, सपने, उम्मीदें सब का एक साथ मर जाना।
यह सब गिनाते हुए ऐसा लग रहा हैं, जैसे कोई मरीज़ ड़ॉक्टर को किसी बिमारी के लक्षण गिना रहा हो। (नींद नहीं आती हैं, भुख तो जैसे मर ही गई हैं) कुछ लोग मानते भी हैं प्रेम एक बिमारी हैं। अगर बिमारी हैं तो इलाज़ हैं इलाज़ हैं तो दवाए भी होनी चाहिए। कोई हमें बताए तो सहीं, किसी प्रेम में पाग़ल प्रेमी के लिए क्या इलाज़ हो सकता हैं, आँख से गिरते अश्को के लिए कौन सी दवा हैं। बड़ी-बड़ी बातों के बीच इस छोटे से सवाल का जवाब नहीं मिलता। कहते हैं, जहाँ दवा काम नहीं आती वहाँ दुआएँ काम आती हैं।
दुआएँ जो भगवान की दया पर चलती हैं। जब भगवान ने पृथ्वी पर प्रेम की सत्ता साधने हेतु अवतार लिया। कृष्ण बन राधा से प्रेम किया। संसार को गीता का ज्ञान दिया। द्वारिकाधिपती हुए तो मोहन को लगा कि उन्होंने सब कुछ जीत लिया हैं। एक दिन कृष्ण ने राधा से कहाँ एक ऐसी जगह बताओं जहाँ में नहीं हूँ ? राधा ने कहाँ, यूँ तो कण-कण में हो मोहन  बस मेरे भाग्य में नहीं हो। कितना सहज हैं ज्ञान प्राप्त करना देना कितना सरल हैं राजा हो जाना। इस अमर संसार में किसी का होकर उसे पाना कितना कठिन हैं। जहाँ भगवान के भी हाथ ख़ाली रह गए। भरतीय इतिहास में प्रेम का पहला अध्याय ही अधूरा हैं। जहाँ से दुनिया को प्रेम का सन्देश मिला, और आज तक हर प्रेम कहानी अधूरी हैं।
जिन्होने प्रेम को पा लिया उनका कभी इतिहास लिखा ही नहीं गया। प्रेम को बस प्रेम ही रहने दे क्या मिला क्या ख़ोया लिख देने भर से क्या होंगा। इतिहास के वो मधुमास लिख देने से क्या विरह वैदना का वो सागर भर जाएँगा। नही, कभी नहीं बस कुछ ज़ख्म फ़िर हरें हो जाएँगे, कुछ आँखे फ़िर नम हो जाएँगी, ये सवाल फ़िर खड़ा हो जाएँगा, क्यूँ दो हाथ हाथों में आते-आते रह गए। इस सवाल का जवाब मेरे पास तो क्या भगवान के पास भी नहीं हैं।
फ़िर ये लिखने की ज़ीद क्यों, लिखने की ज़ीद या कुछ भुलाने की कोशिश क्या मज़ाक हैं। याद आती हैं भुलाने की कोशिश करनी पड़ती हैं। इस भुलाने की कोशिश में वो हर बार याद आ जाती हैं। कोई कविता गीत ग़ज़ल कहानी बन छलक पड़ती हैं, दर्द का इतिहास फ़िर दोहौराया जाता हैं। भुलाने की कोशिश, लिखने की कोशिश, ये कोशिश चलती रहती हैं। लिजिए लिख दिया हैं कुछ इतिहास से, कुछ आप से, कुछ अपने पास से पढ़कर बताईएँगा ज़रूर कैसा लिखा हैं।
                तरूण कुमार, सावन



मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

नारी का सशक्तीकरण


सुप्रीम कोर्ट ने शरई अदालतों की वैधता को भले ही नक़ार दिया हो,लेकिन एक दौर में इन अदालतों के फैसले पूरे देश में माने जाते थे।नाफ़रमानी करने वालों को सज़ा-ए-मौत तक दी जाती थी।मुगल काल में आगरा की शरई आदलते  पूरी सल्तनत के लिए फ़ैसला सुनाती थी,लेकिन हालात अब भी ख़ास नहीं बदले हैं।कम से कम औरतों के लिए तो बदले ही नहीं हैं,जब भी म़र्द को लगता हैं कि क़ानूनी अदालतों में वह औरत को उसके हक़ से वंचित नहीं कर पाएगा तो वो शरीयत अदलतों ख़ाप पंचायतों की गोद में जाकर मन माफिक़ फल प्राप्त कर लेता हैं।और औरत को उसकी औक़ात बता देता हैं।
  तलाक सिर्फ आदमी का हक़ नहीं हो सकता क्योंकि इसके साथ जुडां हैं एक औरत और उसके बच्चों का भविष्य । साल 2011 में ही मुसलिम समाज में लगातार एक तरफा तलाक के तीन मामलें सामने आएं थे । जिसमें पत्नी को बताएं बिना तलाक को मनजुरी प्रदान की फ़तवा जारी करने वाले दारूल उलूम देवबंद सहाब ने । पुरूष प्रधान समाज में धर्म के नाम पर नारी के दर्द की कहानी कोई नई नहीं हैं । मजहब के नाम पर जहां मुसलिम समाज में तलाक,हलाला और इददत जैसी कुप्रथा और मोलानाओं के बेतुके फतवे है। तो वही हिन्दु समाज में पर्दा प्रथा, बाल विवाह जैसी परम्परावादी सोच व खाप पंचायते हैं जो नारी के लिए तालिवानी फरमान जारी करती रहती हैं । इन कुरीतियों को ढोने के लिए आज भी मजबूर किया जाता हैं औरत को । आदमी सारे धर्म-मजहबों में खुद को सुरक्षित रख कर महिलाओं को बलि का बकरा बनाता चला आ रहा हैं ।


यहाँ अदालत ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इमराना पर दिए उस फ़तवे का जिक़्र करते हुए उसे क्रूर अंयायपूर्ण और मानवता को कलंकित करने वाला बताया।जिसके  तहत उसे अपने पति से अलग करके उसके बलात्कारी ससुर के पास रहने को कहा गया था।इसके साथ ही निजी क़ानून और संविधान पीठों के विवाद के साथ प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल का शाहबानों मुकदमा और उससे उठे विवाद और सवाल स्मृति ताजा हो जाती हैं।जो आज तक हमारा पीछा कर रहीं हैं।जहां मुठ्ठी भर लोगों के दवाब में आकर अदालत और सविधान को झुकना पड़ा था। उम्मीद हैं ऐसे हालात फिर पैदा नहीं होंगे।साफ हैं इन फ़तवों के फरमानों में औरत के आरमान ही हर बार जलें हैं।
  आखिर महिलाओं के साथ ये अन्याय क्यों ? क्योंकि आज तक औरत चुप रह कर सब कुछ सहती आ रही हैं । लेकिन 2012 में इस खामोशी को तोडतें हुए । भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन के बैनर तले एक तरफा तलाक,हलाला और इददत जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ आवाज बुंलद की थी ।
  इसकी गुज सुनाई पडी 21 सितंबर 2012 लखनऊ में (दीन की बेटियां मांग रही इंसाफ ) विषय पर आयोजित काँन्फ्रेंस में । जिसे मुसलिम महिला आंदोलन और राष्ट्रीय महिला आयोग व्दारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था । मुसलिम मंहिलाएं और बेटियां ही अब अपने खिलाफ जारी बेतुके फतवों का विरोध करेगी । देवबंदी फतवों पंचायती फरमानों और आँल इंडियां मुसलिम पर्सनल लाँ बोर्ड की महिलाओं के खिलाफ जबरन किए गएं फैसलों की मुखालफत की जाएंगी । एक तरफा तलाक और हलाला को पूरी तरह बंद करने की पैरवी की जाएंगी । ये निष्कर्ष निकल कर सामने आएं थे । यह इक्कीसवी सदी की आधुनिक नारी हैं । जो अपने हक की लडाई लडना जानती हैं । मलाला और दामनी के लिए सघर्ष इसी जंग का एक हिस्सा थें। जिसमें महिलाओं और लड़कियों ने अपनी शक्ती का प्रदर्शन कर पुरूष प्रधान समाज को चेतावनी दी के वह औरत को कमजोर समझने की भूल कदा भी न करे ।यह नारी सशक्तीकरण का दौर हैं ।
 वैसे भी हमने किसी धर्म प्रधान देश का निर्माण न कर सविंधान प्रधान देश का निर्माण किया हैं । जहां एक तरफ हमारे देश में सभी को मजहबी आजादी हैं तो वही दूसरी और कानून सब के लिए बराबर हैं । आदमी और औरत को समान अधिकार प्रदान किए गएं हैं । अगर महिलाएं कानून का दरवाजा खटखटाती हैं तो उन्हें इंसाफ अवश्य मिलेगा । मौलानाओं,खाप पचायतों के व्दारा धर्म बताकर उनकें ऊपर हो रहें जुल्म का अंत अवश्य होगा । जहां एक और नारी सशक्तीकरण की और बड रही हैं । वही सरकार ने भी पिछले कुछ सालों में महिलाओं के हितों को ध्यान में रखते हुएं कानून में संशोधन कर नारी को अवला से सवला बनाने के प्रयास तेज कर दिए हैं ।

                          

तरूण कुमार,सावन
.

रविवार, 9 नवंबर 2014

नगंता और अश्लीलता


अगर भारत विश्व कप में विजयी हो जाता हैं तो मैं सरेआम न्यूड हो जाऊगी ।,माँडल पूनम पाडें के इस बयान को हम सस्ती लोकप्रियता बटोरने की बात कह कर बच नहीं सकते । यह बयान जब आया हैं. जब हमारे देश का एक समुह खुलेपन की वकालत करने में लगा हुआ हैं। इसी का नजारा दिखा हैं,इन पांच सालों में जब इन्टरनेट फैशन पत्रिकाओं आदि के माध्यम से कई माँडल व अभिनेत्रीयों ने खुद को वस्त्रहीन किया । वैसे भी जो खबरे व तस्वीरें हमें नैतिक-अनैतिक , सही-गलत  श्लील-अश्लील आचरण की बहस में घसीटती हैं उनके पीछे भी एक दर्शन हैं क्योंकि वह खुलेपन के दौर में किसी  भी स्वतंत्रताकामी समुह को अपना कायल बना सकती हैं । ये कौतुहल से अधिक विचार करने योग्य प्रश्न है। जिसे सही तरीके से उठा रहे हैं, समाचार-पत्र व फैशन-पत्रिकाओं में छपने वाली नगीं-अर्ध्दनगीं तस्वीरे व खबरें जिन्हें नजर अंदाज नहीं किया जा सकता ।
    जिस्म की आजादी को लेकर भी हमारे देश व पूरी दुनियां में समाजशास्त्रीयों, धर्मशास्त्रीयों व स्वतंत्रताकामी समूहों के बीच एक क्रातिंकारी बहस छीडी हुई हैं । इस बहस के क्यां परिणाम होगें यह किसी से छिपा हुआ नहीं हैं । क्योंकि आज सेक्स,अश्लिलता पर जितनी तेजी से लिखा पढा जा रहा हैं, उतनी ही तेजी से समाज में यह रोग फैल रहा हैं। खासकर युवाओं को इसने अपनी गिरफ्त में ले लिया हैं।फैशन टीवी जैसे चैनलों की लोकप्रियता मोबाईल, इंटरनेट पर अश्लील फिल्मों का व्यापार देश में बढती हुई बलात्कार की घंटनाए इसी और इशारा करती हैं।
    दर असल यूरोप समाज में एक बडा वर्ग हैं जो शरीर की आजादी को पहली और आखरी आजादी की कसौटी मानता हैं । यानी जो बेपर्दा है वही सच हैं । जिस्म की आजादी की वकालत करने वाला एक  समुह हमारे देश में खडा हो गया है , पशिचमी देशों की  तरह ।
    आज तक नारी खुद को वस्त्रों के आवरण में छिपाती आयी है और उसने कभी सरेआम न्यूड होने की बात नहीं कही । भले ही हमने पूनम पाडे को न्यूड होने की इंजाजत न दी हो ,लेकिन क्यां आने वाले समय में कोई आवरण मुक्त होने के लिए कानून का दरवाजा खटखटाएगां तो क्या हम उसे रोक पाएगे नहीं, क्योंकि उस समय उसके पीछे एक बहुत बडा स्वतंत्रताकामी समुह खडा होगा। हमारे पास ऐसा कोई कानून नहीं होंगा जो इस समूह को रोक सकें । सिवाय कुछ कमजोर दलिलों के और उन कमजोर से दलिलों काम चलने वाला नहीं हैं। हमें जल्द ही ऐसे कानून का निर्माण करना होगा जो वस्त्रों के आवरण से समाज को मुक्त न होने दें ।
                                  तरूण कुमार (सावन)
                   


(अमर उजाला काँम्पेक्ट समाचार-पत्र में प्रकाशित)

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

जन-जन की भाषा हैं हिंदी


14 सितम्बर को हिंदी दिवस मनाते हुए हमें पचास साल से अधिक समय हो गया।  इतने सालों में बस एक  ही काम हुआ हैं। बडे-बडे मंचों पर बडे-बडे कवि, लेखक,साहित्यकार या तो हिंदी की उपलब्धिया गिनाते फूले नहीं समाते। या फिर अग्रेजी के बडते कद को लेकर लालत-मलालत कर रहें होते हैं। लेकिन इस सब से परे एक नई सोच को समाज में विस्तार देने का काम किया जा रहा हैं। जाने माने कवि कुमार विश्वाश ने कई बार मंच पर यह कहते सुने गए ``हिंदी का सबसे बडा नुकसान उन्होंने कर दिया जिन्होंने कठिन हिंदी लिखी।`` यह सिर्फ किसी व्यक्ति विषेश की सोच नहीं हैं। इसका पालनकर्ता साहित्य समाज का एक बडा तबक़ा हैं। जो दबी ज़वान में इसका समर्थन अवश्य कर रहा हैं। हिंदी को अगर ख़तरा हैं तो इस फैलती हुई सोच से हैं। यह तर्क मेरे जैसे समान्य बुध्दि रखने वाले प्राणी की समझ से परे हैं। क्योंकि क्या अब हमें अपनी ही मातृभाषा में सरल और कठिन के नए मापदंड स्थापित करने होगे? क्या माँ भी सरल और कठिन होती हैं? इसका अर्थ यह ही हुआ की अब हमें हिंदी के शब्दकोश से उन सभी शब्दों को बहार का रास्ता दिखा देना चाहिए जो कठिन हैं और चलन से बहार हो गए हैं। एक समृध्द शब्दकोश को दयनियता की अंधी भट्टी में झोक दे। जहाँ वह अन्य भाषाओं के बोल चाल के शब्दों को ग्रहण कर असुध्दियों की गर्क में समा जाए। जैसा की आज हो रहा हैं। कवि व लेखक सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए बोल चाल के समान्य शब्दों के अलवा अग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करने में भी संकोच नहीं कर रहें हैं। इसके बजाय एक अच्छी स्थति यह हो सकती हैं। हम नए शब्दों सृजन कर शब्दकोश का विकास करें। जो शब्द चलन से बहार हो गए हैं, उन्हें साहित्य के माध्यम से मुख्य धारा से जोडने का प्रयास करें।
हिंदी का विकास जब तक नहीं हो सकता। जब तक हम एक मत होकर यह स्वीकार न कर ले कि आज हिंदी अपने ही घर में असुरक्षित महसूस कर रही हैं। जब से तरूणों के हाथों में मोबाईल कम्पूटर आया हैं, वह हिंदी से और दूर हो गया हैं। जहां पहले वह पत्रों के माध्यम से हिंदी में पत्र व्यवहार करता था। आज अग्रेजी में मेल कर रहा हैं। हिंदी के शब्दों को भी अग्रेजी में लिख रहा हैं। जबकि कम्प्यूटर व मोबाईल में हिंदी लिखने की सूविधा मौजूद हैं। हिन्दुस्तान का तरूण अग्रेजी का हस्ताक्षर बन कर रह गया हैं।
एक बार संसद में चर्चा के दौरान किसी विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए। गृह मंत्री पी चिदंबरम जी ने कहा था कि `` मैं अपनी बात अग्रेजी में इतनी अच्छी तरह से नहीं कह सकता जितनी मेरे मित्रों ने इस विषय पर हिंदी में कहीं `` इस बात से प्रमाणित हो जाता हैं। टुटी-फुटी अग्रेजी भाषा के आवरण में लपेट कर हम खुद को कितना भी अग्रेजपरस्त दिखाना चाहें। लेकिन आज भी हमारे ह्रदय में हिंदी ही निवास करती हैं। जनमान्यों की भाषा भले ही न हो, पर जन-जन की भाषा आज भी हिंदी ही हैं।
                  तरूण कुमार, सावन